... ... ... अयोध्या की सुबह थी… जहाँ धर्म ने जन्म लिया… एक बालक… जो आगे चलकर मर्यादा बना… राम… राजा दशरथ का पुत्र… पर पहले एक मानव… सत्य की राह चुनी… सुख छोड़कर वन का पथ अपनाया… सीता साथ थीं… लक्ष्मण छाया बने… वनवास नहीं था दंड… वो परीक्षा थी… शांति थी आँखों में… धैर्य था हर कदम… वन भी साक्षी बना… मर्यादा पुरुषोत्तम… फिर आया अहंकार… लंका काँपी… सीता हरण हुआ… और धर्म जाग उठा… लंका जली, रण बजे, आकाश थमे, धरती सजे, धनुष उठा, धर्म खड़ा, अधर्म समझ ले — आज अंत बजे। राम खड़े, दृष्टि अडिग, सत्य का भार, बाहु में बल, दस शीश, सौ चालें, अहंकार की ऊँची दीवारें छल। एक बाण चला, काल रुका, सच ने फिर इतिहास लिखा, अधर्म हारा, धर्म जीता, राम विजय — युग ने देखा। राम… युद्ध में राम… शांति में राम… त्याग में राम… विश्वास में राम… जब युद्ध भी धर्म से हो… वहाँ राम। युग बदले, काल रुके… नाम वही — राम।