
Aaj Hawa Kuch Kehti Hai (Male Version)
**[Mukhda]** आज हवा कुछ कहती है, कुछ सुनकर मुस्काती है, मेरी जेब में धूप का टुकड़ा, चुपके-चुपके गाता है। राहों की पेशानी पर, कोई नर्म लकीर बनी, मैं चलता हूँ, मेरे पीछे, एक हँसी की शाम चली। **[Antara 1]** पेड़ों ने कुछ पत्ते भेजे, मेरे नाम के ख़त जैसे, शाख़ों पर लटके हैं कितने, छोटे-छोटे कल जैसे। भाप उठी तो लगा कि बादल, प्याली में घर कर बैठे, चीनी घुलती रही तलक़ में, लम्हे मीठे होते बैठे। **[Refrain]** आज हवा कुछ कहती है, कुछ सुनकर मुस्काती है, मेरी जेब में धूप का टुकड़ा, चुपके-चुपके गाता है। **[Antara 2]** शीशों के उस पार सजे हैं, कितने रंग, कितने मेले, मैंने अपनी परछाईं से, बाँट लिए कुछ रंग अकेले। एक गुब्बारा उड़ता चला, धागा नीचे झूल रहा, जैसे कोई ख़्वाब पुराना, नई पतंग में खिल रहा। **[Bridge]** कुछ तो है जो नाम न जाने, फिर भी मुझको जान रहा, बिन दस्तक के बंद दरीचे, अंदर से खुलते जा रहे। **[Final Mukhda]** आज हवा कुछ कहती है, कुछ सुनकर मुस्काती है, मेरी जेब में धूप का टुकड़ा, चुपके-चुपके गाता है। राहों की पेशानी पर, कोई नर्म लकीर बनी, मैं चलता हूँ, मेरे पीछे, एक हँसी की शाम चली। **[Outro]** शाम चली... धूप ढली... एक हँसी थी... मेरे साथ चली...

