
बारिश की बूंदें खिड़की पे गिरती रहीं, हर बूंद मेरी आँखों में उतरती रही। हँसता रहा मैं दुनिया के सामने, अंदर मगर मेरी दुनिया बिखरती रही। रातों की तन्हाई कुछ कहती रही, दिल की उदासी मुझे सहती रही। जिसे ढूँढ़ता रहा उम्र भर मैं, वो एक कमी बनकर रहती रही। ये कैसे दिन हैं, ये कैसी रातें, हर पल सुनाती हैं बीती बातें। रोशनी ढूँढ़ता हूँ अँधेरों में, खो गईं जाने कहाँ वो सौगातें। खाली गलियाँ, सूने रास्ते, हर मोड़ पे मिलते हैं सवाल। हज़ार आँसू छुपा लिए मैंने, फिर भी आँखों में रहा मलाल। वक़्त तो अपनी राह चलता रहा, मैं वहीं ठहरा हुआ सा रहा। अपने ही दिल से लड़ता रहा, खुद से ही जाने क्यों हारता रहा। सितारे भी फीके से लगते हैं अब, ख़्वाब भी अधूरे से लगते हैं अब। हर ख़्वाब मुझे फिर तुझ तक लाता है, हर दर्द तेरा नाम दोहराता है। सजदे में जब सिर झुकाता हूँ, ख़ामोश फ़िज़ा से पूछता हूँ— क्या मैं उसी ख़ुदा से भुला दिया गया हूँ? जिसने मेरी हर पुकार सुनी थी कभी, जब दुनिया में मेरा कोई न था, तब जिसने मुझे थामा था कभी। अगर तू वहीं है, तो ख़ामोशी क्यों? मेरी दुआओं में ये बेबसी क्यों? मैंने तो तुझे अपना माना था, फिर मेरी राहों में तन्हाई क्यों? शायद कल फिर सूरज निकलेगा, शायद ये दिल फिर से संभलेगा। शायद तेरी ख़ामोशी में भी, कोई छुपी हुई दुआ होगी। ये उदास दिन भी गुज़र जाएँगे, ये आँसू भी एक दिन थम जाएँगे। राह चाहे जितनी अँधेरी हो, तेरे निशाँ कहीं तो मिल जाएँगे। अगर आँसू मेरी दुआ बन जाएँ, उन्हें भी तू अपनी दया समझ लेना। मैं तेरा चेहरा देख न पाऊँ अगर, मेरी ख़ामोशी को सुन लेना। तू ख़ामोश है, मगर बेख़बर नहीं, ये विश्वास अभी मुझसे जुदा नहीं। रात चाहे जितनी लंबी हो, सुबह की उम्मीद अभी मरी नहीं।

