
[Intro] याद है तुमको वो छोटा सा कमरा हमारा? एक ही थाली में खाते थे, जब नहीं था कोई सहारा। पैसे क्या आए, तुम तो यार हमें ही भूल गए, मुश्किल के वो बीते दिन भी, दौलत पाकर भूल गए। [Verse] मुँह पे दिखाते हो प्यार, दिल में नफ़रत रखते हो, दौलत क्या आई हाथ में, अब हवा में उड़ते हो। जब जेब तुम्हारी खाली थी, दिन-रात रोते रहते थे, सुख-दुख चाहे जैसा आया, दोनों साथ ही रहते थे। ख़्वाजा का पैग़ाम सुनो, दिल किसी का मत दुखाना रे... [Verse] जिस यार ने तुमको पाला, आज उसी से कतराते हो, पहचान छुपाने को अपनी, कैसा नक़ाब लगाते हो? जो काला खेल ये खेला है, कब तक इसे छुपाओगे? उतार फेंक इस मुखौटे को, कब तक झूठ निभाओगे? [Chorus] चेहरे का ये मुखौटा, एक दिन तो टूटेगा रे! झूठ की इस दुनिया में, सच ही आखिर जीतेगा रे! कितना भी छुपा लो चेहरे को, राज़ सभी खुल जाएँगे रे! झूठ का चोला उतरेगा, हर दाग़ यहाँ दिखेगा रे! ख़्वाजा का पैग़ाम सुनो, दिल किसी का मत दुखाना रे... [Verse] दौलत आई तो भूल गए, वो दिन अपनी लाचारी के, भूल गए हम साथ खड़े थे, जब दिन थे बदहाली के। बाहर से बड़े शरीफ़ बने, अंदर आग लगाते हो, दोस्त का दिल तोड़ के फिर, कैसी दोस्ती निभाते हो? [Verse] खाली हाथ ही आए जग में, खाली हाथ ही जाना है, मिट्टी के इस पुतले को, किस बात पे इतराना है? दौलत का ये नशा भी आखिर, एक दिन उतर ही जाना है, जिसने बुरे वक़्त में साथ दिया, वही असली ख़ज़ाना है। ख़्वाजा का पैग़ाम सुनो, दिल किसी का मत दुखाना रे... [Bridge] एक दिन तन्हा बैठा तो, बीता वक़्त याद आया रे, छोटा कमरा, एक ही थाली, सब आँखों में छाया रे। जिस यार को दौलत में भूला, उसका साथ याद आया रे, अपनी करनी याद आई तो, दिल अंदर से पछताया रे। [Chorus] चेहरे का ये मुखौटा, आखिर टूट ही गया रे! दौलत का वो झूठा नशा भी, आज उतर ही गया रे! जिस यार को भूल गए थे, फिर उसका साथ याद आया रे! बिछड़ा हुआ वो अपना यार भी, फिर से गले लगाया रे! [Outro] ख़्वाजा का पैग़ाम समझो, दिल किसी का मत दुखाना रे... मुखौटे सारे छोड़ के, सच्चा इंसाँ बन जाना रे... मुखौटे उतारो रे... अब सच को स्वीकारो रे... नफ़रत दिल में मत पालना रे... मोहब्बत बाँटते जाना रे... ख़्वाजा का पैग़ाम सुनो... मोहब्बत बाँटते जाना रे...

