
इस रंगमंच की कहानी
हँ…हँ…हँ…हम… हँ…हँ…हँ…हम… मैं इस संसार का नाटककार हूँ, हर जन्म से पहले लिखा किरदार हूँ। माँ की गोद में आँखें जो खोलीं, दुनिया नई थी, साँसें थीं भोली, हँसना भी सीखा, रोना भी सीखा, गिरकर उठना, चलना भी सीखा, कल तक खिलौनों की दुनिया थी मेरी, आज वही दुनिया लगती है गहरी। मैं इस संसार का नाटककार हूँ, हर उम्र में बदलता किरदार हूँ। फिर आई जवानी, अरमान आए, दिल में कई रंगीन तूफ़ान आए, किसी को चाहा, किसी को पाया, किसी ने हँसाया, किसी ने रुलाया, जिसे उम्रभर का साथी समझा, वक़्त ने उसको भी राह में छोड़ा। मैं इस संसार का नाटककार हूँ, कभी आशिक़, कभी बेकरार हूँ। फिर उम्र ने धीरे से करवट बदली, चेहरे की रौनक भी थोड़ी ढली, जिन कदमों में कल तक रवानी थी, आज उन्हीं कदमों में थकान मिली, आईना चुप था, मगर कह गया— “जो आया है यहाँ, उसे जाना है।” मैं इस संसार का नाटककार हूँ, अब आख़िरी दृश्य का इंतज़ार हूँ। न दौलत जाएगी, न महल साथ होंगे, न अपने, न रिश्ते, न कल साथ होंगे, जो बाँटा मोहब्बत, वही रह जाएगा, जो दिया दर्द, वही याद आएगा, परदा गिरेगा, तमाशा रुकेगा, हर एक किरदार अकेला छूटेगा। हँ…हँ…हँ…हम… क्या ख़ूब है दुनिया का ये कारोबार, हर कोई यहाँ अपना किरदार निभा रहा है। मैं इस संसार का नाटककार हूँ, कभी राजा, कभी ग़मगीन फ़क़ीर हूँ, जन्म से मृत्यु तक चलता ये सफ़र, सच कहूँ—मैं भी बस एक किरदार हूँ।

