मैं आग की लपटों से तुझसे बोलती हूँ, बसंत की बूंदों सा गीत गुनगुनाती हूँ। हवा की सरसराहट मेरी फुसफुसाहट है, पहाड़ों की गूँज मेरी हँसी की आहट है। मैंने हर भाषा में तेरे लिए गीत लिखे हैं। मेरा रोना — नदी की धार, ठंडक — चोटी का ग्लेशियर, मेरा चिल्लाना — आसमान की गूँज, समुद्री पक्षी की पुकार — सागर के ऊपर। कपास सी नरमी है मुझमें, तूफ़ान सा गुस्सा भी भरा है, पर मेरा प्रेम अनंत है, जैसे ये समुंदर गहरा है। तू सुने या ना सुने, मैं शांति की मूरत हूँ, पर अगर मुझे सताया, तो मैं 'ड्रैगन' का रूप हूँ। मैं एक चट्टान हूँ, मैं जलती हुई रेत हूँ, जो दुख दिया — तो लफ़्ज़ों की ज्वाला में जला दूँगी। (Ending) मैं हर तत्व की शक्ति से बोलती हूँ, सदियों पुराना... धरती सा प्रेम!... ...तुम्हारा प्रेम!...


