नई सुबह का रक़्स (नृत्य) [मुखड़ा - Verse 1] इक दौर था, इस दुनिया की भीड़ में तन्हा था मैं, ग़म का अँधेरा था जहाँ, उस मोड़ पे ठहरा था मैं। हर सम्त (दिशा) था बस खौफ़ सा, दिलों में खिंची दीवार थी, रंजिश में डूबी हर नज़र, बँटी हुई हर राह थी। कोई मुफ़लिस (गरीब), कोई आबाद, सब रौशनी की प्यास में, भटके हुए से चाँद-तारे, एक ही आकाश में। हक़ीक़त हो या फिर कोई हसीन ख्वाब हो, हम सब एक ही मिट्टी के, जैसे महकते गुलाब हों। [प्री-कोरस - Pre-Chorus] मगर जब साज़ पर कोई धुन मचलने लगती है, ज़ेहन की हर इक फ़िक्र जैसे पिघलने लगती है। ये सरगम रूह को जैसे परवाज़ (उड़ान) दे जाती है, भुला कर रंज-ओ-ग़म, ये फिर से याद दिलाती है... [कोरस - Chorus] आओ झूम लें आज, हर कैद से आज़ाद होकर, बहक लें ज़रा, समंदर की हवाओं से आबाद होकर। कदम थिरकें कुछ ऐसे कि सारी सरहदें मिट जाएँ, मोहब्बत और सुकून की, चलो कुछ रस्में निभाएँ। आओ झूम लें, कि सारे दर्द हवा हो जाएँ, रूह के जो नग़्मे हैं, वो आज लबों पर आ जाएँ। चलो बाँट दें अपना नूर (प्रकाश) इस कायनात में, अमर कर लें ये पल, आज की इस रात में। (ओ-ओ-ओ…) (आओ झूम लें…) (ओ-ओ-ओ…) (आओ झूम लें…) [अंतरा 1 - Verse 2] माना कि रातों-रात ये दुनिया बदल नहीं सकती, पर चराग़ों की लौ तो आँधियों से डर नहीं सकती। हर इक मुस्कान, हर वो कदम जो हम साथ बढ़ाएँगे, यकीं मानो, इक नई सहर (सुबह) का पैग़ाम लाएँगे। इश्क़ जब सीने में इक धड़कन सा धड़कता है, तो सूनी ज़िंदगी में भी सुरों का साज़ बजता है। इक खुशमिज़ाज दिल, जला सकता है उम्मीद की मशाल, बदल सकता है वक़्त को, बदल सकता है हर हाल। [ब्रिज 1 - Bridge 1] जब भी हम अजनबी, हमक़दम बन के चलते हैं, नफ़रतों के बनाए वो सारे महल ढहते हैं। दिलों के दरमियाँ की वो दीवारें गिर जाती हैं, और फिर बस मोहब्बत की ही नदियाँ बह जाती हैं। [कोरस - Chorus] आओ झूम लें आज, हर कैद से आज़ाद होकर, बहक लें ज़रा, समंदर की हवाओं से आबाद होकर। कदम थिरकें कुछ ऐसे कि सारी सरहदें मिट जाएँ, मोहब्बत और सुकून की, चलो कुछ रस्में निभाएँ। आओ झूम लें, कि सारे दर्द हवा हो जाएँ, रूह के जो नग़्मे हैं, वो आज लबों पर आ जाएँ। चलो बाँट दें अपना नूर इस कायनात में, अमर कर लें ये पल, आज की इस रात में। [ब्रिज 2 - Bridge 2 (Climax)] उठाओ इन हाथों को, उस नीले आसमाँ की ओर, और तोड़ दो अपनी रूह से बँधी हर एक ज़ंजीर-ओ-डोर। रगों में आज बस इश्क़ का ही सुरूर बहने दो, डर और दर्द के इन सायों को अब दूर रहने दो। आज की रात, हम पहले से भी ज़्यादा आज़ाद हैं, हमारे अंदर का वो सोया हुआ चिराग़, अब बेबाक है। मिलकर चमकेंगे हम आज उस नूर की तरह, तारीक (अँधेरी) रातों में खिलते हुए सितारों की तरह। [आउट्रो - Outro] अब रूह में मेरे बस एक सुकून सा छाया है, जैसे ज़िंदगी ने प्यार का कोई गीत गुनगुनाया है। अब एक मुस्कुराहट और थिरकते कदमों के ही दम पर, मैं बदल सकता हूँ दुनिया, ये यकीं है मुझे अपने आप पर। तो आओ मेरे यारों— चलो झूम लें! (ओ-ओ-ओ…) (चलो झूम लें!) (ओ-ओ-ओ…) (चलो झूम लें!)