जान हाज़िर है मुस्तफ़ा के लिए" खुदा की रज़ा चाहते हैं दो आलम, और खुदा चाहता है रज़ा-ए-मुहम्मद! जान हाज़िर है मुस्तफ़ा के लिए। मेरे मालिक! तेरी रज़ा के लिए। क्या ये कम है? शाहे आक़ा ने चुन लिया है मुझे सना के लिए। जान हाज़िर है मुस्तफ़ा के लिए। मेरे मालिक! तेरी रज़ा के लिए। ग़ारों में रोए हैं आक़ा, सिर्फ़ अपने हर एक गदा के लिए। जान हाज़िर है मुस्तफ़ा के लिए। मेरे मालिक! तेरी रज़ा के लिए। नाम सुन के, झुका लो सर अपने, सय्यदा ज़हरा की हया के लिए। जान हाज़िर है मुस्तफ़ा के लिए। मेरे मालिक! तेरी रज़ा के लिए। खड़े अक़सा में अंबिया थे सभी, लब सरदार-ए-अंबिया के लिए। जान हाज़िर है मुस्तफ़ा के लिए। मेरे मालिक! तेरी रज़ा के लिए। अबू बकर, उमर हैं पहलों में, रब ने जिनको चुना वफ़ा के लिए। जान हाज़िर है मुस्तफ़ा के लिए। मेरे मालिक! तेरी रज़ा के लिए। आशिक़ान-ए-नबी दुआ माँगे, शहर-ए-तैयबा में बस क़ज़ा के लिए। जान हाज़िर है मुस्तफ़ा के लिए। मेरे मालिक! तेरी रज़ा के लिए।