
हम एक ही शहर के मुसाफ़िर हैं
हम एक ही शहर के मुसाफ़िर हैं, फिर क्यों इतना गुमाँ करते हो? मेरा रास्ता पाक, तुम्हारा ग़लत— किस हक़ से ये फ़ैसला करते हो? मेरी राह आसमाँ तक जाती है, तुम्हारी राह गुनाहों से भरी— ये कौन-सी किताब कहती है, कि तुम ही सच हो, हम सभी झूठे हैं? ज़रा ठहरो… ज़रा सोचो… किसने देखा है सच का चेहरा? जिसे तुमने पाप कहा आज, कल वही हो सकता है तुम्हारा पहरा। क्या मेरे पाप तुम्हारे बलिदान से पल भर में पाक हो जाएँगे? क्या मेरे अनैतिक कर्मों की सज़ा तुम ले लो, तो हम बेदाग़ कहलाएँगे? नहीं… ख़ून किसी का प्रायश्चित नहीं, दर्द किसी का सौदा नहीं— विवेक अगर सो गया इंसान का, तो कोई धर्म भी ज़िंदा नहीं। क्यों द्वंद्व की आग में जलते हो? क्यों इंसान को इंसान से बाँटते हो? अपने भीतर एक बार झाँककर देखो, किससे लड़ते हो… किसको हराते हो? तुम भी उसी मिट्टी से आए हो, मैं भी उसी धूल का हिस्सा हूँ, तुम्हारी आँखों में आँसू हैं जैसे, वैसा ही मेरा भी क़िस्सा है। मंदिर हो, मस्जिद हो या कोई राह— सच अगर दिल में जागे कहीं, तो शायद मंज़िल एक ही होगी, बस रास्ते अलग हैं सभी। हम एक ही शहर के मुसाफ़िर हैं, फिर क्यों इतना गुमाँ करते हो? पहले अपने ज़मीर से पूछो— फिर दुनिया पर फ़ैसला करते हो। हम एक ही शहर के मुसाफ़िर हैं… और लौटना भी एक ही ख़ामोशी में है।

