मतला कहीं तुमको ख़फ़ा तो नहीं करते, कहो, कोई ख़ता तो नहीं करते? तुम्हें राज़-ए-दिल हम सुनाते हैं, मगर कुछ बुरा तो नहीं करते? १ तुम इक नर्म झोंका हवाओं का, सुकूँ हो मेरी इन फ़िज़ाओं का। तुम्हीं दर्द-ए-दिल की दवा हो सनम, तुम्हीं आसरा हो वफ़ाओं का। २ मेरी बात सुनकर जो हँसते हो तुम, मेरे दिल में चुपके से बसते हो तुम। कभी चाँदनी, कभी ख़ुशबू-ए-गुल, मेरी रात को यूँ सजाते हो तुम। ३ तुम्हीं हुस्न की इक मिसाल हो, मेरे दिल का मीठा ख़याल हो। तुम हँस दो तो गुलशन भी खिलने लगे, तुम्हीं दिल का नग़्मा, सुर-ताल हो। ४ मेरी हर कहानी सुनी आज तुमने, मेरी बेज़ुबानी सुनी आज तुमने। बिना कुछ कहे मेरा दिल पढ़ लिया, मेरी हर परेशानी सुनी आज तुमने। ५ कभी दिल में कोई मलाल आए तो, कभी आँख में कुछ सवाल आए तो, मुझे अपने पहलू में बुला लेना, कोई दर्द दिल को सताए तो। ६ तुम्हारे लिए बस सुनेंगे सनम, न शिकवा करेंगे, न टोकेंगे हम। जो दिल में छुपा है, सुना देना तुम, तेरी दास्ताँ बस सुनेंगे हम। अंतिम ये वादा करो, जब भी दिल भर आए, मेरी याद चुपके से तुमको सताए, मुझे पास अपने बुला लेना तुम, तेरी दास्ताँ होंठों तक आ जाए। कहीं तुमको ख़फ़ा तो नहीं करते, कहो, कोई ख़ता तो नहीं करते? तुम्हें अपना समझ के कहते हैं सब, सनम, हम गुस्ताख़ी तो नहीं करते?