
जीना भी इक सच है, मरना भी इक रीत, पर जीकर मर जाना… यही सबसे कठिन प्रीत। रोता हुआ आया था, इक मासूम सा बच्चा, दुनिया ने मुस्कानों में भी दर्द का रंग रचा। कलियों-सा बचपन था, बेदाग़ और उजाला, फिर ख़्वाबों का मौसम आया, फिर टूटा हर हवाला। फूलों-सी जवानी भी पतझड़ में ढल गई, हर जीत की चौखट पर इक हार निकल गई। उम्र की ढलानों पर जब साँसें सवाल बनें, अपने ही आईने भी अनजान ख़याल बनें। उम्मीद बिना भरोसा, कैसी ये ज़िंदगी? सच से नज़र चुराती, झूठों की बंदगी। रिश्ते भी धूल निकले, सपने भी राख हुए, कल जिन पे नाज़ था, वो सारे ही ख़ाक हुए। आख़िर ये ज़िंदगी है, या रेत का कारवाँ? मुट्ठी में कुछ न ठहरा, सब खो गया कहाँ? जीता वही रहेगा, जो सच में मर गया, अपने ही अहंकार से जो रोज़ गुज़र गया। वरना तो साँस लेकर चलते हैं लोग सब, ज़िंदा वही है जिसका ज़मीर अभी है अब। आख़िर में बस यही है, दुनिया का फ़ैसला— जिस्मों का अंत होता, सच का नहीं सिलसिला।

