
हो... हो... हो... हो... हो... हो... तेरी गलियों में फिरता हूँ आवारा बनके, डूब रहा हूँ रात के समंदर में बेसहारा बनके। हो... हो... हो... हो... हो... हो... तूने दिए जो ज़ख़्म, वो भी अब हसीन लगते हैं, हम तेरी बेवफ़ाई के भी क़ायदे से मुरीद बनते हैं। खोने लगा हूँ मैं, तेरी ही याद में, टूटा हुआ हूँ इस भीगी सी रात में... तू जो नहीं तो क्या, तेरा दर्द तो पास है, इस बुझते हुए दिल में बस तेरी ही प्यास है। हो... हो... हो... हो... हो... हो... धुएँ में उड़ाता हूँ तेरी पुरानी बातें, काटता हूँ अकेले ये बिन तेरे काली रातें। शीशे के जैसे टूटे हैं ख़्वाब सारे मेरे, पर फिर भी क्यों लबों पे हैं नाम सिर्फ़ तेरे? तन्हाई भी अब तो कोई पुरानी सहेली लगती है, यह ज़िंदगी अब तेरे बिना एक पहेली लगती है। खोने लगा हूँ मैं, तेरी ही याद में, टूटा हुआ हूँ इस भीगी सी रात में... हो... हो... हो... हो... हो... हो... गर मिले फुर्सत तो कभी पलट के देखना, जिस मोड़ पे छोड़ा था, वहीं ठहरा हूँ आज भी। मिट गए हैं सारे निशान मेरी चाहत के, पर तेरे इंतज़ार में जलता है यह चिराग़ आज भी। अब न कोई शिकायत है, न कोई इल्तज़ा, तू खुश रहे बस, यही है मेरी आख़िरी दुआ। हो... हो... हो... हो... हो... हो... बिखर के समेटना सीख लिया है, तेरे बिना जीना अब... सीख लिया है।

