तूफानों में बढ़ा, रणभूमि में सिंह को मारा, जो डर से ना झुका। शत्रु की फौजें काप उठीं, जब युद्ध में छावा कूच किया! (प्री-कोरस) तलवार गरजी, क़यामत बनी, हर वार में बिजली जली! लहू से लिखी जो गाथा थी, वो शेरों की दहाड चाली! (कोरस) छावा! ओ छावा! ज्वाला-सा जलता रहा! बलिदानों का दीपक जला! ना सर झुका, ना क़दम रुके, छावा लड़ा, जब तक दम रहे! (दूसरी पंक्ति) युद्ध में खड़ा, जैसे काल सामने, हर वार में गर्जे, रण के अंगारे! मुगल का दरबार हिल उठा, जब हिंद का शेर गरज उठा! (प्री-कोरस) ज़ंजीरों से बंधा, पर मन नहीं झुका, यातनाएँ मिलीं, पर धर्म नहीं डिगा। हर घाव का उत्तर, हँसकर दिया, छत्रपति का बेटा अमर हो गया! (कोरस – दोहराव) छावा! ओ छावा! काल भी जिससे डरा! आग में जला, पर चिंगारी बनी, स्वराज्य की शपथ से कभी ना हटा! ना मौत से डरा, ना शत्रु से डरा , छावा अमर, जब तक सूर्य रहेगा! (अंतिम पंक्ति – प्रेरणादायक भाव) जहाँ भी दहाड़ेगा कोई युवा, उसमें दिखेगी छावा की छाया! स्वराज्य की शपथ जो कोई ले, वो समझे कि छावा अभी ज़िंदा है! जय भवानी! जय छत्रपति संभाजी महाराज !