
नाराज़गी आज हमें तुमसे शिकवा है, तुमने वादा ही नहीं तोड़ा। दिल पर ऐसे घाव किए हैं, जिन्हें वक़्त ने भी नहीं जोड़ा। आज हमें तुमसे गिला है, वादे तुमने बहुत किए थे। पर उनको निभा न पाए तुम, सपने सारे टूट गए थे। जब हमने तुमसे मोहब्बत की, बे-इंतिहा और सच्चे दिल से। तो हक़ था इतना हमारा भी, कुछ तो कहते हमारे दिल से। अपने इस ग़म को दुनिया से, हम हरगिज़ न छुपाएँगे। नशे का सहारा हो बिना फिर भी सच बतलाएँगे हम शेख़ी के नक़ाब के पीछे, पागलपन न छुप पाएगा। एक न एक दिन सच का सूरज, बादल चीर निकल आएगा। हमारी चुप्पी को तुम कभी, कमज़ोरी मत समझ लेना। हमारी तहज़ीब को, कमज़ोरी मत समझ लेना। देखना एक दिन ऐसा होगा, सच सबके सामने आएगा। चेहरे से नक़ाब गिरेगा, दुनिया का असली चेहरा दिख जाएगा। पछताओगे तब तुम लेकिन, पछतावा कुछ काम न आए। जिस दिन सच की धूप निकली झूठ कहीं भी टिक न पाए। हाँ, आज हम तुमसे ख़फ़ा हैं, इस बात का हक है हमें। आज न हमसे बात करो तुम, आज बहुत नाराज़ हैं हम।

