(Mukhda) दीपक की लौ जैसे जलती रही हूँ तेरी ही यादों में ढलती रही हूँ आएगा तू एक दिन लौटकर इसी एक आस पे पलती रही हूँ (Mukhda) (Antara 1) सर्द हवाओं ने मुझको सताया तन्हाई ने घेरा, तेरा साया आया बुझने न दी मैंने उम्मीद की शम्मा पलकों पे तेरा ही नाम सजाया (Antara 1) (Mukhda - Repeat) दीपक की लौ जैसे जलती रही हूँ तेरी ही यादों में ढलती रही हूँ आएगा तू एक दिन लौटकर इसी एक आस पे पलती रही हूँ (Mukhda) (Antara 2) बीत गए कितने सावन के मेले काटे हैं दिन मैंने हंस के अकेले दिल के झरोखे में तू ही बसा है चाहे जो दुनिया ये खेल भी खेले (Antara 2) (Mukhda - Repeat) दीपक की लौ जैसे जलती रही हूँ तेरी ही यादों में ढलती रही हूँ आएगा तू एक दिन लौटकर इसी एक आस पे पलती रही हूँ (Mukhda)