
सजे हुए सपने आँसुओं में बह गए
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सजे हुए सपने आँसुओं में बह गए, जो अपने थे कभी, सफ़र में कहीं रह गए। दिल ने भरोसे के कितने चराग़ जलाए थे, एक हवा क्या चली, सभी उजाले ढह गए। होंठों पे मुस्कान थी, मगर दिल रोता रहा, ज़ख़्म उम्र भर चुपचाप सीने में ही रह गए। जिन हाथों ने साथ निभाने की कसम खाई थी, वक़्त बदला तो वही हाथ भी पराए हो गए। चाँद से पूछा मैंने, इतना ख़ामोश क्यों है तू? बादलों ने कहा, उसके भी अपने ग़म रह गए। हर ख़ुशी की कीमत दर्द से चुकानी पड़ी, हँसते हुए चेहरे भी भीतर से ढह गए। आज भी तेरी यादों का मौसम नहीं बदला, सूखे हुए फूलों में कितने रंग रह गए। अगर फिर कभी मिलना हो किसी और जन्म में, अधूरे सारे वादे फिर से मुकम्मल हो जाएँ। सजे हुए सपने आँसुओं में बह गए, जीने के सब बहाने भी ख़ामोश रह गए

