
**(भाग 1: आधुनिक भ्रम और आत्म-वंचना)** ये कौनसा रोल है अभी तो सिर्फ डबल रोल के बारे में सोचा था बहरूप किसे कहते है,आज पता चला पहले बॉस फिर बोस फिर साहब और अब साहेब ए शॉक पर हो तो फिर साहिब ए संत कब बनोगे जिंदगी भर कोसते रहे गैरों को, तहखाना खुद में समाया था। रास्ता लोगों से पूछते रहे... एंड्रॉइड सिस्टम ओपन सोर्स! जो चीज हमारे पास है, उसके बारे में बस तहकीकात करने में उम्र गुजार दी। गुणों को देखते तो शायद ये 'काश!' का मलाल न होता, *गुगलेश बन्धु!* इंसान भी क्या चीज है, गुनाह खुद करता है, और लानत भेजता है शैतान को... *मायक्रो सॉफ्ट बाबूजी!* आईना सामने था, मगर किसी और की आँखों में ढूँढते रहे... *क्लोन फोन!* जिस पे शक करना चाहिए था, उसको ही तमाम उम्र भरोसे का खुदा समझते रहे... *चित्र GPT जी!* **(भाग 2: जीवन के कड़वे सच और हकीकत)** सीखते रहे उम्र भर, लहरों से लड़ने का हुनर, हमें कहाँ पता था कि किनारे भी क़ातिल निकलेंगे... *गुप्ता साहेब!* आँख का फन भी ज़रूरी है कमानों के साथ, तीर ही काफी नहीं होता निशाने के लिए। किसी दर्दमंद के काम आ, किसी डूबते को उछाल दे, ये निगाह-ए-मस्त की मस्तीयाँ किसी बद-नसीब पे डाल दे! **(भाग 3: तन्हाई और यादों की पनाह)** तन्हाई का आलम हमसे न पूछो, हम तो डिस्को में भी इयरफोन से दर्द भरे गाने सुनते हैं... *रजिया सुल्ताना, ब्लू हुएल!* क्योंकि... दर्द में भी ये लब मुस्कुरा जाते हैं, बीते लम्हें हमें जब भी याद आते हैं। बीते लम्हें... चंद लम्हात के वास्ते ही सही, मुस्कुराकर मिली थी मुझे जिंदगी। तेरी आगोश में दिन थे मेरे कटे, तेरी बाहों में थीं मेरी रातें कटी, आज भी जब वो पल मुझको याद आते हैं, दिल से सारे गमों को भुला जाते हैं। दर्द में भी ये लब मुस्कुरा जाते हैं, बीते लम्हें हमें जब भी याद आते हैं। बीते लम्हें... मेरे कंधे पे सिर को झुकाना तेरा, मेरे सीने में खुद को छुपाना तेरा, आके मेरी पनाहों में शाम-ओ-सहर, कांच की तरह वो टूट जाना तेरा। आज भी जब वो मंजर नज़र आते हैं, दिल की वीरानियों को मिटा जाते हैं। **(भाग 4: वक्त का फलसफा और अनित्यता)** पर... ला-ला ला-ला-ला, ला-ला-ला... सदा न संग सहेलियाँ, सदा न राजा देश, सदा न जुग में जीवणा, सदा न काला केश। सदा न सुख... सदा न दुःख... सदा न जोवन थिर रहे... वक्त की कसौटी से रास्ता गुजर गया, कुछ निकले खरे सोने से, कुछ का पानी उतर गया। **(भाग 5: आखिरी विद्रोह और समर्पण)** तो फिर... मुझे मस्जिदों की खबर नहीं, मुझे मंदिरों का पता नहीं, मेरी 'आजिज़ी' को क़ुबूल कर, मुझे और दर्द-ओ-मलाल दे! ये मय-कशी का ग़ुरूर है, ये मेरे दिल का सुरूर है, मेरे मय-कदा को दवाम हो, मेरे साकियों को जमाल दे। मैं तेरे विसाल को क्या करूँ, मेरी वहशतों की ये मौत है, हो तेरा जुनूँ मुझे पुर-'अता... मुझे जन्नतों से निकाल दे!


