
झरनों से इतना मधुर संगीत कभी न सुनाई देता, अगर राहों में उनके पत्थर न होते। दर्द की ठोकरों ने ही लफ़्ज़ों को राग बनाया, वरना ये दिल भी यूँ शायर न होते। जो गिर-गिर कर संभले हैं वही चमके हैं जग में, यूँ ही हर मोती दरिया के अंदर न होते। मुस्कुराहट की कीमत भी समझ में तब आती है, जब ग़मों के साए कभी कमतर न होते। ये जो सुरों में छुपा है सुकून का आलम, ये भी शायद बिना उन ठोकरों के न होते। इश्क़ भी अधूरा सा ही रह जाता “राज़”, अगर रास्ते में कुछ पत्थर न होते।

