बादल से कह दो, बरसें नहीं, आँखों में सावन ठहरा है... बिछड़े जो तुमसे, उस पल से, हर लम्हा जैसे ठहरा है... बादल से कह दो, बरसें नहीं, आँखों में सावन ठहरा है... बिछड़े जो तुमसे, उस पल से, हर लम्हा जैसे ठहरा है... चलती हैं ठंडी हवाएँ यहाँ, पर दिल में अब भी तपिश वही… तेरी यादों की चादर तले, हर रात मेरी बेचैन रही... सूरज भी मद्धम सा लगता है, चाँदनी भी फीकी पड़ती है... तेरी बातों की गर्मी बिन, अब आग भी ठंडी लगती है... सपनों में आकर यूँ ना सताओ, चैन की रातें कम हैं अब… तन्हाई के इन गलियारों में, बस अश्कों के मौसम हैं अब... बादल से कह दो... बरसें नहीं... मेरी पलकों में नमी बहुत है... @2025, All rights reserved.