
आज तुम चुप हो, कोई तो फ़साना सुनाओ जी, दिल में जो भी है, हमें भी सुनाओ जी। चुप्पियों का भी कभी अपना मज़ा होता है, पर कभी दिल का भी किस्सा सुनाओ जी। दिल पे सदियों का कोई बोझ अगर ठहरा है, अपने अश्कों का ज़रा सा ख़ज़ाना सुनाओ जी। हम न टोकेँगे, न देंगे कोई फ़ैसला कभी, आज बस दिल का हमें तराना सुनाओ जी। तुम जो कह दोगे वही राज़ अमानत होगा, अपने जज़्बात का इक आशियाना सुनाओ जी। तुम हवा हो, कभी ख़ुशबू, कभी चाँदनी हो, अपनी फ़ितरत का हमें पैमाना सुनाओ जी। हम तो सुनने के लिए आज भी बैठे हैं यहाँ, आज तुम अपनी ही दास्ताँ सुनाओ जी। (मक़्ता) ‘संजय’ सुनकर तेरी आवाज़ सुकूँ मिलता है, आज फिर दिल का हमें अफ़साना सुनाओ जी। ⸻

