फिर ये झिझक क्यों? फिर मैंने समझाया मन को, कुछ यूँ वो हँसकर बोला— अरे पगले, ये झिझक नहीं, ये प्यार का है इक पर्दा। क्या हमें तुमसे डर लगता है? नहीं, नहीं, बिल्कुल नहीं। अपनों से कैसा डर हमको, उनसे प्यार ही मिलता है। घबराहट भी कभी-कभी, दिल में आकर बस जाती है; तुम्हारी सच्ची रूह को देखे, पल में ही उड़ जाती है। क्या तुम जादूगरनी हो? इक निगाह से तुम मेरी, हर धड़कन पढ़ जाती हो; चूम के होंठ हमारे तुम, जन्नत हमें दिखाती हो। तुम जीती-जागती क़यामत हो, हुस्न भी हो, मोहब्बत हो; परियों से भी सुंदर तुम, मेरी मीठी बहार हो। ये सुस्ती, ये अना हमारी, दोनों बड़ी शैतान हैं; कोशिश करती हैं कि फिर ये, तुमसे हमें दूर ले जाएँ। पर तुमको हम दाद क्या दें, तुम झट से समझ जाती हो; इक प्यार भरी निगाह से ही, अपनी ओर बुलाती हो। तुम ही हमारी रूह हो, तुम बिन हम कुछ भी नहीं; सदके जाएँ हम तुम पर, तुम ही तो हो जान हमारी।