
Shiraaz ki Yaden!
हमेशा के लिए एक नीले फ़लक पे पंछी प्यारे, रक़्स करें और पर फैलाएँ; अपनी अपनी शक्ल बनाएँ, तेरा हुस्न मुझे याद दिलाएँ। दूर देस में वो दिन आया, जब मैंने तुझे अपना पाया; होटल शिराज़ में उस दिन, तूने मुझको ख़ूब चौंकाया। तेरा हुस्न, तेरी नज़ाकत, आँखों से सब कह जाती थी; लब ख़ामोश, मगर वो आँखें, हाल-ए-दिल समझा जाती थीं। गेंदे के हम हार पहन कर, बर्फ़ी, रसगुल्ले भी खाए; नाक का ज़ेवर याद है अब तक, मेरे हाथ से खा न पाए। फिर हम दोनों साथ में बैठे, पाक अग्नि को सामने पाकर; पंडित मुरली मनोहर पढ़ते, वैदिक मंत्र सुर में गाकर। इतने में कुछ बूँदें बरसीं, जैसे अर्श से रहमत आई; अपने नए सफ़र पे गोया, जन्नत ने इक मुहर लगाई। दो थे जिस्म, दो जानें अपनी, फिर भी दिल की एक सदा थी; पाक अग्नि के आगे उस दम, दो जीवन की एक कथा थी। शाम हुई, शिराज़ को लौटे, रब की रहमत साथ लिए; दिल की बातें, दिल के जज़्बे, एक-दूजे के नाम किए। दो राहें फिर एक हुईं जब, दो जीवन का संगम हुआ; उस दिन से हम एक हुए थे, दिल से दिल का बंधन हुआ। वक़्त गुज़रे, मौसम बदलें, ये रिश्ता आबाद रहे; दो जिस्मों में एक मोहब्बत, हमेशा एक, हमेशा रहे।

