
(आलाप) हे... ओ... हो... जय हो गंगनाथ ज्यू, न्याय के अवतार, डोटीगढ़ के लाल हो, सुन लो हमारी पुकार॥ जय-जय गंगनाथ ज्यू, डोटीगढ़ के राजा, भक्तन कै रखवाल हो, दुःख हरणा आजा। अलख निरंजन बोल्या, जोगी भेष सँवार, न्याय करन धरती मैं, आयो गंगनाथ अवतार॥ डोटीगढ़ मैं जन्म लियौ, राजा वैभवचंद कै द्वार, प्यूला रानी हँसी खिली, पूरण भयौ परिवार। ज्योतिष बोला धीरे-धीरे, सुन लो सब दरबार, राज न लिखौ भाग मैं, लिखौ जोग अपार॥ अलख... अलख... गंगनाथ ज्यू, जय-जय गंगनाथ ज्यू॥ बागनाथ कै मेले मैं, भाना स्यूँ नैन मिल्या, एक झलक मैं प्रेम खिलौ, मन कै दीप जल्या। भाना बोली, "जोगी बनि कै, एक दिन आना पार", सपना बनि कै बसि गई, राजकुँवर कै द्वार॥ मुखड़ा जय-जय गंगनाथ ज्यू... छोड़ि दियौ सोने को सिंहासन, छोड़ि दियौ दरबार, गुरु गोरखनाथ कै चरणन मैं, पायो ज्ञान अपार। मुरली बाजी, अलख जगायो, काँधै झोली धार, डोटी छोड़ि कुमाऊँ आयो, बनि कै योगी सार॥ दन्या गाँव मैं प्रेम मिलौ, खिली भाना कै हँसी, भाग्य मगर रूठी गयो, आई दुःख की घड़ी। छल-कपट स्यूँ प्राण गँवाए, प्रेम रहौ अमर, भाना-झपरू संग समायो, लोकदेवता स्वर॥ जय हो... जय हो... गंगनाथ ज्यू, न्याय कै रखवार॥ जागर लागी, हुड़को बाजी, जागी जन की आस, अन्यायी कै द्वार पै पहुँची, बाबा की आवाज़। सत्य धरम कै राखणहार, सब पर करैं उपकार, सच्चे मन स्यूँ जो पुकारै, भर दे जीवन प्यार॥ ढोल दमाऊँ गूँजि उठ्या, गूँजी सारी घाट, गंगनाथ ज्यू कै जयकारा, सुनि हँसि उठी धरात। जय-जय गंगनाथ ज्यू, न्याय कै अवतार, भक्तन कै रखवाल हो, सुन लो हमारी पुकार॥ बोलो गंगनाथ ज्यू महाराज की — जय! बोलो न्याय देवता महाराज की — जय! बोलो गुरु गोरखनाथ महाराज की — जय!

