
(अंतरा 1) बचपन में था मैं आज़ाद, सहज जैसे हवा का झोंका, निर्भय, निश्छल हंसी मेरी, नभ जैसा था मन का कोना। समाज ने बाँधा नियमों में, केंद्र से दूर कर डाला, अपने होने की रोशनी को, परछाइयों में छुपा डाला। अहंकार बन गया मेरा साथी, झूठा ये चेहरा पहना, भीड़ में खोकर खुद से कट गया, भीतर का घर ही बिकना। कुछ भी करूं, खुशी न मिले, बस निराशा का साया, सपनों के मेले में खड़ा, खालीपन का गहरा साया। (मुखड़ा) ओ मेरे दिल... तू लौट आ, सच्चे केंद्र पे आ... मैं हूं, मैं हूं... ये स्मरण जगा... झूठे को छोड़ दे, आनंद का विस्फोट जगाना है, आत्म स्मरण से, ये मन बदलना है... (मैं हूं... मैं हूं...) (अंतरा 2) परिधि पर जीते हैं हम, समाज की इजाज़त में बंधे, हर मोड़ पे रुककर देखें तो, अपने ही कदम हमसे अछूते। चुनाव लगते अपने, पर यांत्रिक हैं सब फंदे, डोर कहीं और से हिलती, नाचते हम पुतले जैसे। आठ शादियां की उसने, हर बार वही पुरानी कहानी, नया चेहरा, नई रस्में, पर पीड़ा वही अनजानी। बाहर बदलते रहे, अंदर वही बेहोशी की निशानी, दिल की अदालत में चलता, एक ही खटकी हुई रवानी। दुष्चक्र में घूमते, आज्ञा मानते चलते आए, आदत की जंजीरें पहन, खुद को ही कैद बनाए। स्वतंत्रता खो दी, असली केंद्र दबा बैठे, सोने की इस भीड़ में हम, जागने से डरते रहते। (मुखड़ा) ओ मेरे दिल... तू लौट आ, सच्चे केंद्र पे आ... मैं हूं, मैं हूं... ये स्मरण जगा... झूठे को छोड़ दे, आनंद का विस्फोट जगाना है, आत्म स्मरण से, ये मन बदलना है... (मैं हूं... मैं हूं...) (अंतरा 3) झूठा केंद्र कैंसर सा फैलता, बोझ बन जाता है, हर भूमिका के भार तले, असली चेहरा घबराता है। संग्रह करता हूं सब कुछ, विकास कहां होता है, ढेरों चीज़ें, शून्य अनुभव, भीतर कुछ न खिलता है। प्रेम करूं तो अभिनय लगे, प्रार्थना भी धोखा बने, शब्द तो मीठे हों होंठों पर, पर दिल के द्वार न खुलें। पहले स्मरण करो "मैं हूं", तब सच्चा रंग चढ़े, सच की थोड़ी सी धूप पड़े तो, झूठे चेहरे गलते दिखें। नींद में भी जागो जैसे योगी, कृष्ण की गीता गाए, हर सांस में सुन लो भीतर से, अर्जुन को देते समझाए। हलकापन आएगा, भारीपन दूर भाग जाए, बूंद-बूंद ये जागरण बनकर, सागर सा फैल जाए। (ब्रिज - हीरोइन के साथ ध्यान सीन) तू मेरी सच्चाई बन, मैं तेरा केंद्र बनूं, तेरी आँखों की ख़ामोशी में, अपना आकाश चुनूं। झूठे बंधन तोड़ें, स्वतंत्र होकर जीएं... हाथों में हाथ नहीं, बस होने में होकर जीएं। परमात्मा पुत्र है, हमसे जन्म लेगा, जब हम अपनी मिट्टी बनें, बीज स्वयं ही अंकुर लेगा। स्वयं बनकर, भगवत्ता को छुएं... हर धड़कन में नाम न लें, पर उसकी सुगंध को जिएं। (अंतिम मुखड़ा) ओ मेरे दिल... तू लौट आ, सच्चे केंद्र पे आ... मैं हूं, मैं हूं... ये स्मरण हमेशा जगा... झूठे को विदा कर, सहज बनकर मुस्कुराना है, भीड़ के बीच अकेला रहकर, खुद से गले मिल जाना है। आत्म स्मरण की साधना से, मुक्ति पाना है... हर क्षण में "मैं हूं" की ज्योति से, अपना घर पहचानना है। (मैं हूं... मैं हूं... मैं हूं...)

